क्या दुनिया का मूड बदल रहा है? प्यू रिसर्च के 36 देशों में किए गए ग्लोबल एटीट्यूड्स सर्वे 2026 के मुताबिक अब अधिकांश देशों में चीन की छवि अमेरिका से बेहतर हो गई है. कई देशों में लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा भरोसा शी जिनपिंग पर जताया है.Explainer: 30 देशों की पहली पसंद बना चीन, अमेरिका केवल 6 में आगे; क्या वर्ल्ड ऑर्डर बदल रहा है?क्या दुनिया का मूड बदल रहा है? प्यू रिसर्च के 36 देशों में किए गए ग्लोबल एटीट्यूड्स सर्वे 2026 के मुताबिक अब अधिकांश देशों में चीन की छवि अमेरिका से बेहतर हो गई है. कई देशों में लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा भरोसा शी जिनपिंग पर जताया है.
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अभिजीत श्रीवास्तव
दुनिया से
जुलाई 17, 2026 16:03 IST
Published On
जुलाई 17, 2026 13:13 IST
Last Updated On
जुलाई 17, 2026 16:03 IST
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करीब आठ दशक तक दुनिया की राजनीति में अमेरिका सबसे प्रभावशाली ताकत माना जाता रहा. आर्थिक ताकत, सैन्य शक्ति, लोकतंत्र और वैश्विक नेतृत्व की वजह से अधिकांश देशों में उसकी मजबूत छवि रही है, पर अब यह तस्वीर तेजी से बदल रही है. अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के ग्लोबल एटीट्यूड्स सर्वे 2026 बताती है कि दुनिया के कई देशों में पहली बार चीन की छवि अमेरिका से बेहतर हो गई है. इतना ही नहीं, कई देशों के लोगों का भरोसा अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तुलना में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर अधिक है.
यह सर्वे 36 देशों में 8 फरवरी से 13 मई 2026 के बीच किया गया.
रिपोर्ट के मुताबिक कुछ साल पहले तक अधिकांश देशों में अमेरिका को चीन से बेहतर नजरिए से देखा जाता था. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दो बड़े बदलाव एक साथ हुए.
पहला, चीन की छवि लगातार बेहतर हुई. दूसरा, अमेरिका की लोकप्रियता लगातार घटती चली गई. इन दोनों रुझानों ने मिलकर वैश्विक तस्वीर पूरी तरह बदल दी.
अब 36 देशों में से अधिकांश में लोग चीन को अमेरिका से अधिक सकारात्मक नजरिए से देखते हैं. सबसे बड़ा बदलाव एशिया-प्रशांत और मध्य पूर्व के कई देशों में दर्ज किया गया.ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में छवि को सर्वाधिक नुकसान
प्यू रिसर्च का कहना है कि अमेरिका की छवि में सबसे बड़ी गिरावट राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद देखने को मिली. ट्रंप से पहले जो बाइडन के कार्यकाल के दरम्यान भी अमेरिका की लोकप्रियता कुछ देशों में घटी थी, लेकिन तब भी अधिकांश देशों में अमेरिका की छवि चीन से बेहतर बनी हुई थी. पर 2026 आते-आते यह समीकरण पूरी तरह से उलट गया है.
यानी ट्रंप की सत्ता में वापसी ने दुनिया में अमेरिकी छवि को नुकसान पहुंचाया है और आज स्थिति यह है उनकी वापसी के बाद से दुनिया में अमेरिका के प्रति नजरिया हद से अधिक नकारात्मक हो चला है.
इस सर्वे में सबसे दिलचस्प पहलू यह निकल कर आया कि दुनिया के जिन प्रमुख देशों में चीन की लोकप्रियता, अमेरिका से आगे निकल गई है उनमें से कई तो नेटो के सदस्य देश हैं और अब तक अमेरिका के समर्थक देशों में उनकी गिनती होती रही है. आलम ये है कि अमेरिका के सबसे करीबी पड़ोसी कनाडा और मेक्सिको में भी चीन ज्यादा लोकप्रिय हो चुका है.
कनाडा में हुए शिफ्ट का उदाहरण
2023 में 57 फीसद कनाडाई, अमेरिका को सकारात्मक नजरिए से देखते थे, तब केवल 14 फीसद लोग चीन के पक्ष में थे. 2025 में दोनों करीब-करीब बराबरी पर आ गए. अब 2026 में 44 फीसद कनाडाई चीन को सकारात्मक मानते हैं, जबकि अमेरिका के पक्ष में महज 33 फीसद लोग हैं. यानी केवल तीन वर्षों में ये तस्वीर पूरी तरह बदल गई.
किन देशों में अमेरिका अब भी आगे है?
हालांकि पूरी दुनिया में ऐसा नहीं है. सिर्फ छह देशों में अमेरिका की लोकप्रियता अब भी चीन से ज्यादा है. जिनमें चार एशियाई देश भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और फिलीपींस शामिल हैं.
एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इन देशों में चीन के साथ सीमा विवाद, समुद्री सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव और रणनीतिक चुनौतियों की वजह से अमेरिका के प्रति भरोसा अपेक्षाकृत मजबूत बना हुआ है.
ट्रंप vs जिनपिंग
सर्वे में लोगों से पूछा गया कि विश्व मामलों में सही फैसले लेने के लिए वे किस नेता पर ज्यादा भरोसा करते हैं. तो वैसे तो दोनों देशों के लीडर्स ट्रंप और जिनपिंग पर भरोसा बहुत ज्यादा नहीं है. लेकिन अधिकांश देशों में शी जिनपिंग, डोनाल्ड ट्रंप से आगे निकल गए हैं. यूरोप के लगभग सभी प्रमुख देशों में शी को ट्रंप से बेहतर रेटिंग मिली.
कई ऐसे विकसित देशों ने जिनपिंग के समर्थन में अपना वोट रखा. इनमें जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, स्पेन, नीदरलैंड, ग्रीस, स्वीडन जैसे देश शामिल हैं.
हालांकि यहां भी शी जिनपिंग को बहुत ऊंची रेटिंग नहीं मिली पर यह ट्रंप से अधिक है. ब्रिटेन में जिनपिंग 37 फीसद पसंद किए गए तो
ब्रिटेन में उन्हें सबसे ज्यादा 37 फीसद समर्थन मिला. यानी दुनिया ट्रंप से ज्यादा शी पर भरोसा तो कर रही है, लेकिन दोनों नेताओं को लेकर उत्साह सीमित है.
भारत में स्थिति अलग
भारत इस सर्वे में अलग तस्वीर पेश करता है. भारतीयों का भरोसा डोनाल्ड ट्रंप पर शी जिनपिंग से ज्यादा है. ऐसा ही जापान और फिलीपींस में भी देखने को मिला. दक्षिण कोरिया में दोनों नेताओं को लगभग समान समर्थन मिला.
दिलचस्प बात यह है कि पिछले वर्ष दक्षिण कोरिया में ट्रंप पर भरोसा शी की तुलना में लगभग दोगुना था. यानी वहां भी तेजी से बदलाव आया है.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अमेरिका अब भी आगे
सर्वे में एक और महत्वपूर्ण सवाल पूछा गया. क्या अमेरिका और चीन की सरकारें अपने नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करती हैं?
इस मामले में अमेरिका अभी भी चीन से आगे है. ज्यादातर लोग मानते हैं कि अमेरिकी सरकार व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करती है. लेकिन यहां भी अमेरिका की बढ़त तेजी से कम हो रही है.
क्यों घट रहा है यह अंतर?
2021 के बाद लगभग हर देश में लोगों का अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है. स्वीडन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है.
2021 में स्वीडन के 61 फीसद लोग मानते थे कि अमेरिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करता है. पर अब यह केवल 27 फीसद पर सिमट गया है.
इसी तरह कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, नीदरलैंड, दक्षिण कोरिया और स्पेन जैसे देशों में 25 फीसद या उससे अधिक की गिरावट देखी गई.
चीन की छवि कहां सुधरी?
जहां अमेरिका की रेटिंग गिरी, वहीं कुछ देशों में चीन की छवि बेहतर हुई. उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया में 2021 की तुलना में अब ज्यादा लोग मानते हैं कि चीन भी अपने नागरिकों की स्वतंत्रता का सम्मान करता है. हालांकि यह आंकड़ा फिलहाल कम है लेकिन बढ़ोतरी स्पष्ट झलक रही है.
हालांकि रिपोर्ट का एक और दिलचस्प निष्कर्ष यह भी है कि अब बहुत कम लोग यह मानते हैं कि अमेरिका या चीन दोनों में से कोई भी सरकार अपने नागरिकों की स्वतंत्रता का पूरी तरह सम्मान करती है.
यानी अमेरिका की रेटिंग घटी है, चीन की कुछ बढ़ी भी है. पर दोनों ही देशों के प्रति लोगों का भरोसा सीमित है.
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मामले में किन देशों में सबसे बड़ा अंतर?
इजराइल में 80 फीसद लोग मानते हैं कि अमेरिका व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान करता है. जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा केवल 15 फीसद है. जापान में भी अमेरिका और चीन के बीच बड़ा अंतर है.
वहीं दूसरी ओर बांग्लादेश, इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, वेस्ट बैंक और ईस्ट जेरूसलम में अधिकांश लोगों का मानना है कि चीन अपने नागरिकों की स्वतंत्रता का अमेरिका से कहीं बेहतर सम्मान करता है.
कौन ज्यादा दखल देता है- चीन या अमेरिका?
प्यू रिसर्च ने 17 मध्यम आय वाले देशों में अमेरिका और चीन की विदेश नीति को लेकर भी लोगों की राय ली. परिणाम अमेरिका के लिए चुनौतीपूर्ण हैं.
75 फीसद लोगों का मानना है कि अमेरिका दूसरे देशों के मामलों में जरूरत से ज्यादा दखल देता है.
जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा केवल 45 फीसद है.
यानी अधिकांश देशों में अमेरिका को ज्यादा हस्तक्षेप करने वाली शक्ति माना जाता है.
भरोसेमंद साझेदार कौन?
ये सर्वे बताता है कि कई विकासशील देशों में चीन को अमेरिका की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद साझेदार माना जा रहा है. लोगों का मानना है कि चीन विकास परियोजनाओं में मदद करता है. स्थिरता बढ़ाता है. और छोटे देशों के हितों को ज्यादा महत्व देता है.
दक्षिण अफ्रीका: 72 फीसद लोगों ने चीन को भरोसेमंद साझेदार बताया. जबकि अमेरिका के लिए यह आंकड़ा केवल 46 फीसद रहा. 64 फीसद लोगों ने कहा कि चीन वैश्विक शांति और स्थिरता में योगदान देता है. 2023 में यही आंकड़ा केवल 47 फीसद था.
पाकिस्तान: 84 फीसद लोगों ने चीन को भरोसेमंद साझेदार माना. जबकि अमेरिका के लिए यह आंकड़ा केवल 36 फीसद रहा.
फिलीपींस: यहां तस्वीर बिल्कुल उलट है. 81 फीसद लोगों ने अमेरिका को भरोसेमंद माना. जबकि चीन के लिए यह आंकड़ा 42 फीसद रहा.
लैटिन अमेरिका: यहां चीन और अमेरिका दोनों के बीच बराबरी की टक्कर देखने को मिली. अर्जेंटीना, ब्राजील, कोलंबिया, और पेरू जैसे देशों में अब अमेरिका और चीन को लगभग बराबर का साझेदार माना जा रहा है. यानी जहां कभी अमेरिका का स्पष्ट दबदबा था, वहां अब चीन बराबरी पर पहुंच चुका है.
चीन के प्रति ये नजरिया क्यों बदल रहा है?
ये सर्वे इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देती, लेकिन एक्सपर्ट मानते हैं कि इसके पीछे कई वजहें हैं. चीन ने पिछले एक दशक में बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (वन बेल्ट, वन रोड) के जरिए एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में बड़े पैमाने पर निवेश किया है.
पर दूसरी तरफ अमेरिका की विदेश नीति, ट्रेड वॉर, अमेरिकी टैरिफ, हालिया सैन्य हस्तक्षेप और ट्रंप प्रशासन की अन्य नीतियों को लेकर कई देशों में सवाल बढ़े हैं. यही वजह है कि कई देशों में चीन अब केवल एक आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एक भरोसेमंद वैश्विक साझेदार के रूप में भी देखा जाने लगा है.
प्यू रिसर्च सेंटर का यह सर्वे बेशक कोई चुनावी नतीजा नहीं है पर बदलते वर्ल्ड ऑर्ड का एक शुरुआती संकेत माना जा सकता है. बेशक सैन्य हो या तकनीकी मामले, या अर्थव्यवस्था की बात हो- चीन के 20.8 ट्रिलियन डॉलर के मुकाबले अमेरिका 31.8 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी है.
लेकिन जिस तरह वैश्विक जनमत के इस सर्वे में चीन को बढ़त मिलती दिख रही है, यह अमेरिका की कमजोर पड़ती विश्वसनीयता की झलक है. अगर यह रुझान आगे भी जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में दुनिया में कूटनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक संतुलन पहले से बिल्कुल अलग दिखाई दे सकता है.