टीएमसी के लिए बीजेपी का लोकसभा से लेकर राज्यसभा वाला प्लान, ममता बनर्जी की बढ़ेगी मुश्किल!

बीजेपी ने ममता बनर्जी की टीएमसी के लिए कई प्लान एकसाथ एक्टिव कर रखे हैं. लोकसभा से लेकर राज्यसभा और राज्य विधानसभा में बंगाल की पूर्व सीएम के लिए मुश्किल बढ़ने वाली है.
राज्यसभा से इस्तीफा देने वाले तृणमूल कांग्रेस के तीन सांसद सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बारीक गुरुवार शाम को कोलकाता में बीजेपी में शामिल हुए. उसके कुछ ही देर बाद बीजेपी ने पश्चिम बंगाल से राज्य सभा की तीन सीटों पर 24 जुलाई को होने वाले उपचुनावों में उन्हें अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया. यह तीनों सीटें इन्हीं के त्यागपत्र से खाली हुईं थीं. चूंकि राज्यसभा उपचुनाव हर सीट पर अलग होता है, ऐसे में इन तीनों की जीत अब केवल एक औपचारिकता मात्र ही है.

अभी ऑपरेशन TMC खत्म नहीं
सूत्रों के अनुसार राज्य सभा में टीएमसी को तोड़ने का यह ऑपरेशन अभी खत्म नहीं हुआ है. एक अन्य टीएमसी राज्यसभा सांसद रुक्मणी मलिक इस्तीफा दे चुकी हैं. लेकिन उन्होंने अपना त्यागपत्र बजाए सभापति से व्यक्तिगत तौर पर मिल कर देने के, ईमेल से भेज दिया था. जल्दी ही वे उपसभापति से मिल कर त्यागपत्र देने की औपचारिकता पूरी कर सकती हैं. उनके अलावा राज्यसभा में बचे टीएमसी के नौ सांसदों में से दो और इसी रास्ते पर जा सकते हैं. यह सभी बीजेपी में शामिल होकर दोबारा राज्यसभा आ सकते हैं.

बीजेपी की नीति के खिलाफ
यह बीजेपी की उस सार्वजनिक घोषणा के खिलाफ है जिसमें उसने विधानसभा में भारी जीत के बाद कहा था कि वह टीएमसी के नेताओं को अपने साथ नहीं लेगी क्योंकि वे भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी के आरोपों से जूझ रहे हैं. हालांकि कल प्रदेश अध्यक्ष शमिक भट्टाचार्य ने सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बारीक को बीजेपी में लेते समय इसे एक अपवाद बताया. वे इससे पहले अच्छी टीएमसी और बुरी टीएमसी का सिद्धांत भी प्रतिपादित कर चुके हैं जिसके तहत भालो टीएमसी के नेताओं को साथ लेने में गुरेज नहीं होगा.

ममता को लगेगा और झटका?
दरअसल, टूट से पहले टीएमसी के राज्यसभा में 13 सांसद थे. इनमें टूट और बीजेपी या अन्य दल में विलय के लिए 9 सांसद चाहिए. ममता बनर्जी ने वफादारी के पैमाने पर खरे उतरने वाले नेताओं को ही राज्यसभा भेजा था. हालांकि इसके बावजूद पांच सांसद छिटक गए लेकिन टूट के लिए जरूरी दो तिहाई यानी 9 सांसद पूरे नहीं हो पा रहे. यही कारण है कि बीजेपी ने सांसदों से इस्तीफा दिलवा कर, उनके इस्तीफे से खाली हुई सीट के उपचुनाव पर उन्हें ही टिकट देकर अपने निशान पर राज् सभा भेजने की रणनीति अपनाई जिसे धीरे-धीरे अमलीजामा पहनाया जा रहा है। इसके दो लाभ हैं- पहला तो यह है कि बीजेपी के राज्यसभा में अपने सांसदों की संख्या लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर टीएमसी भी धीरे-धीरे कमजोर हो रही है और उसके बिखराव की प्रक्रिया तेज हो रही है. दो तिहाई से 11 सांसद कम
24 जुलाई के बाद राज्यसभा में बीजेपी की संख्या 117 पहुंच जाएगी जो उसके इतिहास की अब तक की सर्वाधिक संख्या है. इस तरह बीजेपी अपने बूते राज्यसभा में साधारण बहुमत यानी 123 से केवल छह दूर रह जाती है. अगर सात मनोनीत और तीन निर्दलीय (परिमल नथवाणी, कार्तिकेय शर्मा और दिलीप रे) को मिला लें तो बीजेपी साधारण बहुमत के आंकड़े को पार कर 127 पर पहुंच जाती है. वहीं सहयोगी दलों के साथ यह संख्या दो तिहाई के आंकड़े यानी 164 के करीब पहुंच रही है. बीजेपी के सहयोगी दलों में टीडीपी, एआईएडीएमके, जेडीयू और एनसीपी के चार-चार, शिवसेना और यूपीपीएल के दो-दो, आरपीआई ए, एजीपी, एमएनएफ, एनपीपी, आरएलएम और जनसेना पार्टी के एक-एक सांसद हैं. यानी बीजेपी के सहयोगी दलों की संख्या 26 है. इस तरह एनडीए का आंकड़ा 153 तक पहुंच गया है जो दो तिहाई के आंकड़े से केवल 11 कम है.

लोकसभा में बीजेपी की रणनीति
वहीं टीएमसी को लोकसभा में तोड़ने के लिए बीजेपी ने अलग रणनीति बनाई है जिसे अंजाम भी दे दिया गया है. इसके तहत पार्टी के 28 में से 20 लोक सभा सांसदों ने अलग होकर अपना विलय एक गुमनाम दल एनसीपीआई में कर एनडीए को समर्थन देने का फैसला कर लिया है. यह संख्या टूट के लिए जरूरी दो तिहाई से अधिक है. अब इस फैसले पर स्पीकर को मुहर लगाना है. उसके बाद लोकसभा में एनडीए की संख्या भी बढ़ जाएगी. हालांकि दो तिहाई के आंकड़े से उसकी दूरी बरकरार रहेगी.

ममता से छिन जाएगी TMC?
इस तरह ममता बनर्जी से टीएमसी छीनने के लिए दिल्ली से कोलकाता तक अलग-अलग रणनीति पर काम किया जा रहा है. कोलकाता में रितुब्रता बनर्जी की अध्यक्षता में साठ से अधिक विधायक अलग हो चुके हैं. रितुब्रता को विधानसभा अध्यक्ष ने नेता विपक्ष के तौर पर मान्यता दे दी है. इस तरह से कोलकाता में टीएमसी विधायक दल में टूट हो गई. रितुब्रता का कहना है कि यह टूट की शुरुआत है और अब आगे संगठन में ब्लॉक और अन्य स्तर पर भी टूट होगी. रितुब्रता अपने धड़े को असली टीएमसी बता रहे हैं. चुनाव आयोग के सामने वे असली टीएमसी होने का दावा भी कर चुके हैं और जल्दी ही आयोग चुनाव चिन्ह के बारे में अपना फैसला सुना सकता है. इस तरह ममता बनर्जी को अब दो मोर्चों पर कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है. पहली कोलकाता में यह साबित करने की लड़ाई है कि असली टीएमसी उनका धड़ा ही है. दूसरी ओर दिल्ली में यह साबित करने की लड़ाई कि 20 बागी सांसद अलग नहीं हो सकते और उन्हें अयोग्य घोषित किया जाए. इस आशय का पत्र स्पीकर को दिया जा चुका है जिसमें सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए 20 सांसदों के एनसीपीआई में विलय पर सवाल उठाते हुए उन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है.

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