ईरान-अमेरिका के समझौते से क्यों इतनी जल्दी खुश नहीं होना चाहिए? डील के रास्ते में अब कितने कांटे बचे हैं

ईरान का दावा है कि समझौते के तहत अमेरिका अगले 30 दिनों के भीतर अपनी नाकेबंदी पूरी तरह हटा लेगा. वहीं, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई समय सीमा तय नहीं की है.अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी युद्ध को खत्म करने के लिए एक ऐतिहासिक शांति समझौते की घोषणा की गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को सोशल मीडिया पर इस बड़े फैसले का ऐलान करते हुए कहा कि ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने, हॉर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को हटाने पर सहमति बन गई है. दोनों देशों के बीच इस समझौते (MoU) पर आगामी शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में हस्ताक्षर किए जाएंगे.

पाकिस्तान और कतर की मध्यस्थता से तैयार हुआ यह समझौता दुनिया भर के बाजारों के लिए एक बड़ी राहत लेकर आया है. इस समझौते की खबर के बाद कच्चे तेल की कीमतों में 4 फीसदी से ज्यादा की भारी गिरावट दर्ज की गई है.

हालांकि, यह समझौता सिर्फ तात्कालिक युद्ध को रोकने का एक जरिया लगता है, क्योंकि असल और सबसे पेचीदा विवादों को अभी भी सुलझाना बाकी है. ईरान का परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों को हटाना, फ्रीज किए गए फंड और लेबनान में आगे की स्थिति जैसे बड़े मुद्दों को भविष्य की बातचीत के लिए टाल दिया गया है. फिलहाल दोनों पक्षों के बीच 60 दिनों के सीजफायर यानी युद्धविराम पर सहमति बनी है.

युद्धविराम की शर्तें क्या हैं
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और ईरान की सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के मुताबिक, इस समझौते के तहत लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तुरंत और स्थायी रूप से रोक दिया जाएगा. लेकिन इस शुरुआती समझौते को लेकर अमेरिका और ईरान के दावों में अभी से विरोधाभास दिखने लगा है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने जहां नाकेबंदी को ‘तुरंत’ हटाने की बात कही थी, वहीं अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि शुक्रवार को आधिकारिक हस्ताक्षर होने के बाद ही नाकेबंदी हटाई जाएगी.इसके अलावा दोनों देश इस समझौते के बुनियादी ढांचे को भी अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं. अमेरिकी राजनयिकों का कहना है कि यह केवल 60 दिनों के लिए युद्ध रोकने का एक प्रारंभिक समझौता है ताकि आगे की बात हो सके. दूसरी तरफ, ईरान इसे युद्ध की पूर्ण समाप्ति की घोषणा मान रहा है. जानकारों का कहना है कि पर्दे के पीछे हुई बातचीत के कारण यह भी साफ नहीं है कि दोनों देश एक ही मसौदे पर राजी हुए हैं या दोनों के पास अलग-अलग शर्तें हैं.

हॉर्मुज और अमेरिकी नाकेबंदी में भी पेंच
इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना है. ईरान ने पिछले कई महीनों से इस रणनीतिक समुद्री रास्ते को बंद कर रखा था, जिससे दुनिया भर में तेल, गैस और उर्वरक की सप्लाई ठप हो गई थी. इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों की नाकेबंदी कर दी थी. अब इस रास्ते को खोलने पर सहमति तो बनी है, लेकिन इसे अमली जामा पहनाने के तरीके पर दोनों देशों की राय जुदा है.

ईरान का दावा है कि समझौते के तहत अमेरिका अगले 30 दिनों के भीतर अपनी नाकेबंदी पूरी तरह हटा लेगा. वहीं, अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने ऐसी कोई समय सीमा तय नहीं की है. अमेरिका का प्लान है कि जैसे-जैसे ईरान समुद्र से बारूदी सुरंगें हटाएगा और जहाजों की आवाजाही सामान्य होगी, वैसे-वैसे अमेरिकी नाकेबंदी को चरणों में कम किया जाएगा. अमेरिका इस नाकेबंदी को ईरान पर दबाव बनाए रखने के एक औजार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहता है.

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ईरान के परमाणु कार्यक्रम का भविष्य
इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. इस समझौते में इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं हो पाया है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, ईरान के पास इस समय 60% तक संवर्धित 440.9 किलोग्राम यूरेनियम का स्टॉक मौजूद है. चूंकि हथियारों के लिए 90% संवर्धित यूरेनियम की जरूरत होती है, इसलिए ईरान परमाणु बम बनाने के बेहद करीब है. भले ही ईरान इसे शांतिपूर्ण कार्यक्रम बताता आया है, लेकिन अमेरिकी हमलों में क्षतिग्रस्त हुई अपनी तीन परमाणु साइटों के नीचे छिपे यूरेनियम को छोड़ने के लिए वह तैयार नहीं है.

अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का कहना है कि इस समझौते का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि ईरान कभी भी परमाणु हथियार न बना सके और उसके इस कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करके यूरेनियम को देश से बाहर भेजा जाए. इसके विपरीत, ईरान का कहना है कि उसे यूरेनियम को देश के भीतर ही पतला करने की अनुमति दी जानी चाहिए. रूस ने भी इस स्टॉक को अपने पास रखने की पेशकश की है. अब 60 दिनों की बातचीत में यह तय होगा कि इस यूरेनियम का क्या होगा और ईरान की निगरानी कैसे की जाएगी. लेकिन समझौते की मूल शर्ते होने के बावजूद इसपर कोई फैसला नहीं हो पाया है.

जब्त किए गए अरबों डॉलर पर एकमत नहीं ईरान-अमेरिका
परमाणु कार्यक्रम के अलावा, विदेशों में फ्रीज पड़े ईरानी पैसों को जारी करने को लेकर भी दोनों देशों के बीच एक राय नहीं है. ईरान के उप-विदेश मंत्री काजेम गारीबाबादी का कहना है कि अगले दौर की बातचीत तभी आगे बढ़ेगी जब अमेरिका उसकी शर्तों को पूरा करेगा, जिसमें अमेरिका द्वारा ईरान के 25 अरब डॉलर के फ्रीज फंड को जारी करना शामिल है. ईरान चाहता है कि बातचीत के अगले चरण से पहले उसे यह आर्थिक राहत मिले.

अमेरिका ने ईरान के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया है. अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि यह ‘काम के बदले पैसा’ का सौदा है. जब तक ईरान अपनी प्रतिबद्धताओं और वादों को पूरा नहीं करता, तब तक उसे एक भी डॉलर नहीं दिया जाएगा. पैसे की रिहाई और शर्तों को पूरा करने के इस ‘क्रम’ का विवाद इतना गहरा है कि अगर इसे जल्दी नहीं सुलझाया गया, तो शुक्रवार के बाद होने वाली मुख्य बातचीत खटाई में पड़ सकती है.

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