लखनऊ से लेकर दिल्ली तक आम आदमी पार्टी की तमाम कार्यक्रम और राजनीतिक गतिविधियां इस बात का इशारा करती दिखाई दे रही हैं. सूत्र बताते हैं कि AAP यूपी में अपने पैर पसारने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर आगे बढ़ सकती है.

यूपी विधानसभा चुनाव 2027 की सुगबुगाहट अब एक बड़ी राजनीतिक हलचल में तबदील हो चुकी है. भले ही चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन सत्ताधारी दल से लेकर विपक्ष तक सभी ने अपनी सियासी बिसात को बिछाना शुरू कर दिया है. इसी सियासी घमासान में एक बेहद दिलचस्प समीकरण की सुगबुगाहट दिल्ली से लेकर लखनऊ तक बनी हुई है. राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा बड़ी तेजी से चल रही है क्या 2027 में अखिलेश यादव की ‘साइकिल’ पर आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल सवार होंगे? अगर ऐसा होता है तो केजरीवाल इन और कांग्रेस आउट होगी या फिर अखिलेश दोनों को साथ लेकर चलेंगे. दिल्ली के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा काफी है कि आम आदमी पार्टी गुजरात , गोवा, हरियाणा के बाद अब यूपी के रण में देखने को मिल सकती है. हालांकि इस बारे में अभी तक AAP की तरफ़ से कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन जानकारों के मुताबिक आम आदमी पार्टी की तैयारी पूरी है.

सपा की राजनीति और जमीनी तैयारी?
2025 के लोकसभा चुनाव में मिली भारी सफलता के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के हौसले लगातार बुलंद हैं. सपा इस बार किसी भी हाल में उत्तर प्रदेश की सत्ता में वापसी चाहती है. सपा ने अभी से ही बूथ स्तर पर अपनी पैठ मजबूत करना शुरू कर दिया है. इस बार अखिलेश यादव ने केवल अपने पारंपरिक वोट यादव मुस्लिम के समीकरण पर निर्भर न रहकर PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक कार्ड को और आक्रामक ढंग से खेलने का ब्लूप्रिंट तैयार किया है. राम मंदिर चंदा घोटाले से लेकर यूपी और देश के अन्य मुद्दों को लेकर अखिलेश यादव बीजेपी और यूपी सरकार पर काफ़ी हमलावर भी दिखाई दे रहे हैं.

यूपी में AAP की एंट्री से सेट होगा नया चुनावी गणित
राजनीतिक जानकारों और पार्टी सूत्रों की मानें तो इस बार यूपी की चुनावी जंग में आम आदमी पार्टी भी एक नया मोर्चा खोलने की तैयारी में है. हालांकि, AAP की तरफ से इस बात का कोई औपचारिक ऐलान नहीं किया गया है. लेकिन लखनऊ से लेकर दिल्ली तक आम आदमी पार्टी की तमाम कार्यक्रम और राजनीतिक गतिविधियां इस बात का इशारा करती दिखाई दे रही हैं. सूत्र बताते हैं कि AAP यूपी में अपने पैर पसारने के लिए समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर आगे बढ़ सकती है. दिल्ली और पंजाब मॉडल के ज़रिए यूपी में एंट्री की उसकी बड़ी तैयारी है.

पिछले एक साल से AAP के यूपी प्रभारी संजय सिंह लगातार उत्तर प्रदेश में कई कार्यक्रम कर चुके हैं वह लगातार यूपी में सक्रिय हो कर आम आदमी पार्टी के लिए जमीन तैयार करते दिखाई दे रहे हैं. दिल्ली और पंजाब में मुफ्त बिजली, पानी और बेहतरीन स्कूलों के मॉडल को ‘आप’ यूपी की जनता के सामने सपा के मंच से भुनाना चाहती है. जानकारों का कहना है कि आम आदमी पार्टी शहरी मतदाताओ पर ख़ास फोकस कर रही है और अगर AAP और सपा के गठबंधन की बात बनी तो इससे दोनों का एक नया राजनीतिक समीकरण बनता दिखाई दे सकता है. इसके कयास इसलिए भी हैं क्योंकि दिल्ली में केजरीवाल के लिए प्रचार करने अखिलेश यादव आए थे. इसके अलावा हरियाणा में भी साथ दिया था. हरियाणा और दिल्ली में कांग्रेस और ‘आप’ के बीच दूरी दिखी थी, लेकिन अखिलेश यादव ने पुराने सहयोगी कांग्रेस को छोड़ कर AAP पार्टी का साथ दिया था.कांग्रेस के ‘हाथ’ में सिर्फ सस्पेंस और रार!

एक तरफ सपा और AAP के बीच नजदीकियों की सुगबुगाहट तेज है. वहीं कांग्रेस की स्थिति “सस्पेंस” से भरी नजर आ रही है. लोकसभा चुनाव 2024 में इंडिया गठबंधन के तहत सपा और कांग्रेस ने मिलकर शानदार प्रदर्शन किया था. लेकिन 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए यह राह इतनी आसान नहीं दिख रही. कांग्रेस लगातार बराबर सम्मान और भागीदारी की बात करके समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की कोशिश में जुटी नजर आ रही है . वहीं सपा की तरफ़ से भी कांग्रेस को जमीनी हकीकत का बार बार संदेश दिया जा रहा है.

हाल ही में कांग्रेस सांसद इमरान मसूद और अन्य नेताओं के बयानों से सपा और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर अंदरूनी खींचतान साफ उजागर हुई है. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि हम सीट की भीख नहीं मांग रहे, गठबंधन में बैठकर बराबर हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं. वही सपा जहां खुद को राज्य में ‘बड़े भाई’ की भूमिका में देख रही है, वहीं कांग्रेस 2024 की संजीवनी के बाद अधिक सीटों पर दावा ठोकने की रणनीति बना रही है. ऐसे में अगर अखिलेश यादव ने कांग्रेस को दरकिनार और दूर किया और ‘आप’ जैसी छोटी पार्टियों को तरजीह दी तो कांग्रेस के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन बचाना मुश्किल भी हो सकता है क्योंकि पिछले कई विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन देखने को लगातार मिलता रहा है.

यूपी 2027: एक बहुकोणीय मुकाबला?

भाजपा भी अपनी रणनीति को धार देना शुरू कर दिया है चाहे नए चेहरों व सामाजिक समीकरणों की बात हो बीजेपी भी लगातार हर पहलू पर यूपी में अपनी पकड़ पर खास काम करती दिखाई दे रही है. ऐसे में विपक्षी एकता के सामने कई चुनौतियां हैं. क्या सपा, कांग्रेस और आप मिलकर बीजेपी को चुनौती दे पाएंगे? या फिर सीट-बंटवारे के मतभेदों के चलते ‘इंडिया’ गठबंधन यूपी में बिखर जाएगा? फिलहाल उत्तर प्रदेश की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी।

राम मंदिर मुद्दे पर अखिलेश केजरीवाल और कांग्रेस की एकता

अयोध्या राम मंदिर चंदा घोटाले मामले पर विपक्षी एकता लगातार देखने को मिल रही हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव हों या अरविंद केजरीवाल दोनों ही केंद्र सरकार और बीजेपी को लगातार आगे बढ़ते और घेरते दिखाई दे रहे हैं. पिछले कई दिनों में कांग्रेस ने भी इस मुद्दे को उठाया, लेकिन केजरीवाल के राजनीतिक बयानों और सुंदरकांड, हनुमान चालीसा की खूब चर्चा हुई है. एक चिंता तो कांग्रेस को ही है कि हमेशा आम आदमी पार्टी ने उसके ही वोटों को काटा है. ऐसे में यूपी में यदि वह एंट्री करती है तो कांग्रेस सावधान ही रहेगी. ऐसे में देखना होगा कि कांग्रेस गठबंधन में रहेगी या फिर एकला चलो की राह अपना लेगी.

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