अमित शाह से ट्रंप के दूत सर्जियो गोर की मुलाकात क्यों खास? समझिए भारत-अमेरिका साझेदारी की नई अहमियत

दुनिया के सबसे अहम द्विपक्षीय रिश्तों में से एक, जो अभी बन ही रहा है, उसके लिए 18 जून की बैठक कागज पर भले ही मामूली लगे. लेकिन रणनीतिक साझेदारी की भाषा में यह एक अहम बात है.अक्सर कूटनीति में दिखाई देने वाली तस्वीरें, बाद में जारी होने वाले आधिकारिक बयानों से ज्यादा असरदार होती हैं. 18 जून, 2026 को G7 समिट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात के ठीक 24 घंटे बाद, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली स्थित अपने दफ्तर में भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर से मुलाकात की. इस मुलाकात का महत्व गौर करना जरूरी है.

राजदूतों से अक्सर नहीं मिलते अमित शाह
अमित शाह ऐसे मंत्री नहीं हैं, जो राजदूतों या विदेशी प्रतिनिधिमंडलों से मिलने के लिए आसानी से समय निकाल लेते हों. विदेशी दूतों के साथ उनकी मुलाकातें सोच-समझकर और बहुत कम होती हैं, और लगभग हमेशा किसी खास सुरक्षा जरूरत से जुड़ी होती हैं. पिछली बार उन्होंने जुलाई 2023 में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी से औपचारिक रूप से मुलाकात की थी. उस मुलाकात का भी मुख्य मकसद सुरक्षा से जुड़ा था. यह पैटर्न एक अहम बात बताता है: जब शाह अमेरिकी दूत के लिए अपना समय निकालते हैं, तो इसका मतलब है कि वॉशिंगटन और नई दिल्ली किसी बात पर मिलकर गंभीरता से काम कर रहे हैं.

दोनों पक्षों की ओर से जारी संयुक्त बयान अपनी स्पष्टता और बारीकियों के कारण महत्वपूर्ण है. शाह ने एक ही बार में “आतंकवाद-विरोधी और नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने” की बात कही. राजदूत गोर ने भी लगभग उन्हीं शब्दों को दोहराया और “आतंकवाद से निपटने, अपने लोगों को नशीले पदार्थों और अवैध ड्रग्स से बचाने, अपनी सीमाओं को सुरक्षित करने और अपराधियों को मिलकर सजा दिलाने” के लिए सहयोग का जिक्र किया. यह शिष्टाचार वाली कूटनीति की आम या घिसी-पिटी भाषा नहीं थी. यह एक ऐसी ऑपरेशनल पार्टनरशिप की भाषा थी, जो अब और तेजी से आगे बढ़ रही है.R&AW से जुड़ा लिंक
यह बैठक अचानक नहीं हुई थी. इससे पांच हफ्ते से भी कम समय पहले, 15 मई को शाह ने ‘RN काओ मेमोरियल लेक्चर’ दिया था. यह भारत की विदेशी खुफिया एजेंसी, R&AW द्वारा आयोजित एक सालाना कार्यक्रम था, जिसमें 40 से ज्यादा देशों के राजदूत और हाई कमिश्नर शामिल हुए थे. खुद राजदूत गोर भी इसमें मौजूद थे. इस कार्यक्रम का विषय था: ‘नशीले पदार्थ: एक ऐसी चुनौती जिसकी कोई सीमा नहीं, और एक सामूहिक जिम्मेदारी’. शाह का भाषण महज एक लेक्चर नहीं, बल्कि एक रणनीतिक घोषणापत्र जैसा था. उन्होंने दुनिया को चेतावनी दी कि नशीले पदार्थों का संकट ऐसा रूप ले ले जिसे पलटा न जा सके, उससे पहले शायद उनके पास बस एक दशक का समय है. उन्होंने मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे, नियंत्रित पदार्थों की एक जैसी परिभाषाओं, तस्करी के लिए एक जैसी सजा, ड्रग किंगपिन के प्रत्यर्पण की आसान प्रक्रिया और रियल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने ड्रग से होने वाली कमाई, आतंकवाद को मिलने वाली फंडिंग और वैकल्पिक सत्ता केंद्रों के तौर पर उभरने वाले ‘नार्को-स्टेट्स’ (नशीले पदार्थों के व्यापार पर आधारित देश) के बीच साफ फर्क बताया.

उस भाषण ने भारत के बौद्धिक सुरक्षा ढांचे की नींव रखी. 18 जून को गोर के साथ हुई बैठक से इस ढांचे को बनाने की शुरुआत हुई.

अमेरिकी प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बहुत अहम है और यह कोई इत्तेफाक नहीं है. ट्रंप प्रशासन ने अंतरराष्ट्रीय ड्रग सप्लाई चेन को खत्म करने, खासकर उस चेन को जो फेंटानिल संकट को बढ़ावा देती हैं, अपनी विदेश नीति की मुख्य प्राथमिकताओं में से एक बना लिया है. अमेरिका ने नार्को-ट्रैफिकिंग नेटवर्क के खिलाफ बहुत सख्ती से काम किया है; उसने आर्थिक दबाव, प्रतिबंधों और खुफिया संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह से किया है कि लैटिन अमेरिका और उसके बाहर भी संबंध बदल गए हैं. भारत, जो ‘गोल्डन क्रिसेंट’ और समुद्री ड्रग रूट के बीच रणनीतिक रूप से बहुत अहम जगह पर स्थित है, इस कोशिश में बहुत काम का साझेदार है. नशीले पदार्थों के मामले में मोदी सरकार का “जीरो टॉलरेंस” का रुख—यानी एक ग्राम भी अंदर ना आए और ना ही यहां से गुजरे—सिर्फ घरेलू राजनीति का वादा नहीं है; यह वॉशिंगटन डीसी को रणनीतिक भरोसा दिलाने का एक कदम भी है.

सिर्फ ड्रग्स तक सीमित नहीं
लेकिन यह पल सिर्फ ड्रग्स के खिलाफ कार्रवाई से कहीं ज्यादा अहम है. यह दो दशकों की कड़ी मेहनत से बने रिश्तों के मिलन बिंदु पर है. ‘भारत-अमेरिका व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदारी’ – जिसका जिक्र शाह ने बैठक के बाद अपने बयान में किया था – उसे 2008 के ऐतिहासिक सिविल न्यूक्लियर समझौते के बाद से धीरे-धीरे मजबूत किया गया है. रक्षा सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करना, सप्लाई चेन को मजबूत बनाना, टेक्नोलॉजी का ट्रांसफर, अंतरिक्ष और अब डिजिटल अर्थव्यवस्था – इन सभी क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच का ढांचा पहले से कहीं ज्यादा गहरा और अहम हो गया है. लंबे समय से बातचीत के दौर से गुजर रही एक ट्रेड डील अब पहले के किसी भी समय की तुलना में ज्यादा करीब नजर आ रही है, क्योंकि मोदी और ट्रंप के बीच G7 बैठक ने इसे नई राजनीतिक गति दी है.

इस संदर्भ में, शाह की गोर के साथ मुलाकात एक संकेत भी है और एक मजबूत आधार भी. यह संकेत देता है कि सुरक्षा संबंध — जो किसी भी साझेदारी का सबसे मुश्किल और संवेदनशील पहलू होता है — आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों के साथ-साथ आगे बढ़ रहे हैं. यह संकेत देता है कि भारत नशीले पदार्थों की तस्करी रोकने (काउंटर-नारकोटिक्स) के मामले में सिर्फ बातें करने के बजाय असल सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने को तैयार है; और वह भी उसी गंभीरता के साथ, जिसके साथ उसने पिछले दशक में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी है. और यह निरंतरता का भी संकेत है — चाहे व्हाइट हाउस में कोई भी बैठे या रायसीना हिल में, भारत-अमेरिका साझेदारी की रणनीतिक सोच ने एक ऐसी संस्थागत गति पकड़ ली है, जो किसी एक नेता से कहीं ऊपर है.

सरहदों से परे संबंध
दुनिया के सबसे अहम द्विपक्षीय रिश्तों में से एक, जो अभी बन ही रहा है, उसके लिए 18 जून की बैठक कागज पर भले ही मामूली लगे. लेकिन रणनीतिक साझेदारी की भाषा में यह एक अहम बात है. यह दिखाता है कि दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्र ना सिर्फ मूल्यों और व्यापार के मामले में एक साथ हैं, बल्कि वे उन खतरों से अपने लोगों को सुरक्षित रखने के जरूरी काम में भी साथ हैं, जो किसी सरहद या झंडे की परवाह नहीं करते. अमेरिका-भारत सुरक्षा गठबंधन के आने वाले समय पर ध्यान देना जरूरी है.

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