बंगाल में चुनावी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस में बगावत हो गई है. विधायकों के बाद सांसद भी बागी हो गए हैं. इससे एनडीए को फायदा हो रहा है, क्योंकि संसद में उसकी ताकत बढ़ रही है.दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में आजकल एक बात को लेकर बड़ी चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों में टूट से किसको फायदा होने जा रहा है? तृणमूल कांग्रेस का विधायक दल टूटा तो कहा गया कि विधायकों के सामने ऐसी परिस्थिति बन गई है कि उनके पास कोई चारा नहीं है मगर अब यही बात तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के बारे में भी कही जा रही है. अब इस बात की चर्चा है कि तृणमूल कांग्रेस के 28 में से 20 सांसद एक नया गुट बना कर लोकसभा में अलग बैठने की मांग करेंगे और अपने आप को असली तृणमूल कांग्रेस घोषित करेंगे.
TMC टूटी तो फायदा किसे?
अब बात करते हैं कि तृणमूल कांग्रेस में टूट से किसको फायदा पहुंच सकता है? लुटियंस दिल्ली के राजनीतिक चर्चाओं की मानें तो सरकार संसद के मानसून सत्र में महिलाओं को आरक्षण, परिसीमन और एक देश एक चुनाव का संविधान संशोधन बिल लाने की तैयारी में है. पिछली बार जब सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन बिल लेकर आई थी तब लोकसभा में यह बिल 54 वोटों से गिर गया था. मगर तब से लेकर अब तक देश की राजनीति में बहुत कुछ घट गया है. डीएमके इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी है और तृणमूल कांग्रेस में भारी बगावत. ऐसे में एनडीए एक मौका देख रही है कि मानसून सत्र में इन बिलों को पास करा लिया जाए.
नंबर गेम क्या होगा?
अब जरा आंकडों को देखते हैं. 543 की लोकसभा में अभी 3 सीट खाली है तो दो तिहाई बहुमत का आंकड़ा 360 हो जाता है. एनडीए के पास 293 सांसद हैं. इसमें डीएमके के 22 और तृणमूल कांग्रेस के अलग होने वाले 20 सांसदों की संख्या मिला दें तो आंकड़ा 335 का हो जाता है. फिर बचते हैं वाईएसआर कांग्रेस के 4, आम आदमी पार्टी के 3, 1 अकाली दल और 7 निर्दलीय सांसद. एनडीए की नजर इनमें से वाईएसआर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और निर्दलीय सांसदों पर होगी.ये भी कहा जा रहा है कि एनडीए की नजर दक्षिण भारत की छोटी-छोटी पार्टियों पर भी है. मगर इन सबको जोड़ दिया जाए तब भी एक दर्जन सांसद कम पड़ रहे हैं. ऐसे में एनडीए की नजर शिवसेना उद्धव के 9 सांसदों और समाजवादी पार्टी के सांसदों पर हो सकती है.
विपक्ष के एनडीए पर आरोप
जब एनडीटीवी ने सपा सांसद राजीव राय से इस बारे में बात की तो उनका कहना है कि “बीजेपी अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सकती है. बीजेपी का सारा खेल डिलिमिटेशन के जरिए सत्ता हथियाने की है. ये पहले भी कोशिश कर चुके हैं मगर सफल नहीं रहे. ये लोकतंत्र की हत्या है. पहले ये विधायक तोड़ते हैं, फिर पार्टियों को तोड़ने लगे, मगर अब तो पार्टी हड़पने में लगे. हम इनके मंसूबे पूरे नहीं होने देंगे.’
राज्यसभा में क्या होगा?
ये तो बात हुई लोकसभा की. एनडीए को ऐसी ही मशक्कत राज्यसभा में भी करनी पड़ेगी और वहां भी दो तिहाई बहुमत जुटाने की रणनीति पर काम हो रहा है. बीजेडी और तृणमूल कांग्रेस के एक-एक सांसदों का इस्तीफा हो चुका है. आगे देखना होगा कि ऐसे और कितने इस्तीफे होते हैं?