मार्को रूबियो के ताजमहल जाने पर ईरान ने ली चुटकी, बोला- अगर इतिहास पता होता तो आप सौ बार सोचते

ईरान ने कहा कि अगर अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो को ताजमहल का इतिहास पता होता तो वो यहां जाने से पहले कई बार सोचते. ऐसा इसलिए क्योंकि इसका भी ईरानी कनेक्शन है.अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो का भारत दौरा आज (26 मई 2026) खत्म हो गया. अपने दौरे की शुरुआत उन्होंने कोलकाता से की. फिर दिल्ली आए और इसके बाद आगरा और जयपुर घूमने गए. आगरा जाकर उन्होंने ताजमहल देखा और इसकी तस्वीर भी सोशल मीडिया पर पोस्ट किया. इस तस्वीर पर ईरान ने चुटकी ले ली.

दरअसल रूबियो ने ताजमहल के सामने बने मशहूर बेंच पर बैठकर तस्वीरें खिंचवाईं. सोशल मीडिया पर जैसे ही यह तस्वीर सामने आई हैदराबाद में मौजूद ईरानी वाणिज्य दूतावास ने इस तस्वीर पर चुटकी लेते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर रुबियो को इस इमारत के इतिहास या इसकी वास्तुकला की समझ होती, तो शायद वह यहां खड़े होकर फोटो खिंचवाने से पहले कई बार सोचते. ईरान ने कहा कि यह आलीशान इमारत एक मुगल बादशाह ने अपनी ईरानी बेगम की मोहब्बत में बनवाई थी, जिसे तराशने वाले भी ईरान के ही हुनरमंद कारीगर थे.

क्या है ताजमहल का ईरान कनेक्शन?
ईरान ने इस बहाने अमेरिका और ईरान के पुराने तनाव को भी हवा दे दी. दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान की हजारों साल पुरानी सभ्यता को नेस्तनाबूद करने की धमकी दी थी. उस वक्त भी ईरानी फौज ने अमेरिका के इस तेवर का मजाक उड़ाया था. ईरान का कहना था कि महज 250 साल के इतिहास वाले अमेरिका को ईरान की 6,000 साल पुरानी गौरवशाली विरासत पर उंगली उठाने का कोई हक नहीं है. अब मार्को रुबियो का ताजमहल जाना ईरान के लिए उसी पुराने जख्म को कुरेदने का एक बड़ा जरिया बन गया.अगर ताजमहल के इतिहास पर नजर डालें, तो इसका ईरान से बेहद गहरा और अटूट रिश्ता रहा है. मुगल शहंशाह शाहजहां ने साल 1632 में अपनी तीसरी बेगम मुमताज महल की याद में इस मकबरे का निर्माण कराया था. मुमताज महल का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था और वह भारत के एक रसूखदार ईरानी कुलीन परिवार से ताल्लुक रखती थीं. उनके पिता अब्दुल हसन आसिफ खान मुगल दरबार में एक ऊंचे ओहदे पर बैठे ईरानी रईस थे.
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मुमताज का तेहरान से रिश्ता
मुमताज महल के दादा, मिर्जा गियास बेग (जिन्हें बाद में एत्माद-उद-दौला का खिताब मिला) मूल रूप से ईरान की राजधानी तेहरान के रहने वाले थे. वह साल 1577 में ईरान से पलायन कर भारत आए और अकबर के शाही दरबार का हिस्सा बने. इसी खानदानी रिश्ते की वजह से मुमताज महल, मुगल सल्तनत की सबसे ताकतवर मल्लिकाओं में से एक नूरजहां की भतीजी भी लगती थीं, जो जहांगीर की खास बेगम थीं. मुमताज महल की मां दीवानजी बेगम भी ईरान के काज़्विन शहर के एक बेहद सम्मानित रईस ख्वाजा गियासुद्दीन की बेटी थीं.

यही वजह है कि ताजमहल को आज के आधुनिक ईरान की सीमाओं से बाहर, फारसी या ईरानी वास्तुकला का सबसे बेजोड़ और नायाब नमूना माना जाता है. इस इमारत की बनावट में जो विशाल गुंबद, संगमरमर पर की गई बारीक पच्चीकारी और पूरी इमारत में दिखने वाला बेमिसाल संतुलन है, वह सीधे तौर पर ईरानी वास्तुकला से प्रेरित है.

क्या और भी कोई कनेक्शन है?
ताजमहल की खूबसूरती में चार चांद लगाने वाला ‘चारबाग’ भी पूरी तरह से ईरानी की देन है. इस विशाल बाग को चार बराबर हिस्सों में बांटने वाली पानी की नहरें बनाई गई हैं, जो इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक जन्नत (स्वर्ग) में बहने वाली चार नदियों हैं. यह पूरा खाका शुद्ध रूप से पारसी बागवानी कला का हिस्सा है, जिसे मुगल भारत लेकर आए थे.

इतना ही नहीं, ताजमहल की संगमरमर की दीवारों पर जो पवित्र कुरान की आयतें उकेरी गई हैं, उन्हें चुनने और लिखने का जिम्मा भी ईरान के शिराज शहर के मशहूर कैलीग्राफर अब्दुल-हक को सौंपा गया था. उनके इस लाजवाब हुनर से खुश होकर ही शाहजहां ने उन्हें ‘अमानत खान’ का शाही खिताब दिया था.