बंगाल और असम में बीजेपी की जीत से निकला देश में चुनावी राजनीति का टेंपलेट?

यूपी में चुनाव जीतने के लिए जरूरी समीकरण पूरे देश से अलग हैं. यहां जाति और धर्म के बीच हमेशा कांटे की टक्कर रहती है. यहां पर ध्रुवीकरण की राजनीति को जाति से लड़ना पड़ता है. वक्त के साथ बीजेपी ने इस जाति को तोड़ने और समाज को जोड़ने के कई प्रमुख दांव आजमाए हैं.कहा जा रहा है कि अब बीजेपी पूरे देश में असम और पश्चिम बंगाल की चुनावी टेंपलेट पर चुनाव लडेगी. ऐसे में सवाल है कि ये टेंपलेट क्या है? उसमें ऐसा क्या है कि जो वहां भी चल गया और वो यूपी सहित 7 राज्यों के विधानसभा चुनाव में भी सक्सेसफुल रहेगा? फरवरी-मार्च 2027 से नवंबर-दिसंबर 2027 के बीच में सात राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसमें पंजाब और यूपी के अलावा पांच राज्यों में बीजेपी की ही सरकारें हैं. तो क्या है देश में चुनावी राजनीति का भविष्य? जानिए इस रिपोर्ट में…

चुनाव की राजनीति हिन्दू और मुसलमान के हाईवे पर आ गई है. इसे 2027 में उत्तर प्रदेश से गुजरना है, लेकिन इसमें एक सवारी पहले से सवार है और वो है महिला आरक्षण बिल पर बीजेपी की हार. इसका कॉकटेल ही असम और पश्चिम बंगाल की टेंपलेट कहा जा रहा है, जिसे पूरे देश के चुनावों में लागू किया जाएगा. पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नतीजों के तुरंत बाद कहा,“ बिहार में तेजस्वी यादव, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की छुट्टी हो चुकी है और अब यूपी में अखिलेश यादव का सफाया होगा.” कहने का मतलब ये कि राज्यों में रीजनल पार्टियों को हटाने के लिए बीजेपी ने पूरी तैयारी कर ली है और उसकी प्रयोगशाला रहे हैं असम और पश्चिम बंगाल. बंगाल विजय के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा, “संसद में महिला आरक्षण बिल का साथ नहीं देने की सजा यूपी में अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी को मिलेगी.”

धर्म और जाति का विजयी मिश्रण
असम और पश्चिम बंगाल के चुनाव में हिमंता बिस्वा सरमा और शुभेंदु अधिकारी ने अपने चुनाव प्रचार में जमकर और खुलकर हिन्दू-मुस्लिम किया है. हर चुनावी रैली में घुसपैठ, बांग्लादेशी मुसलमान को मुद्दा बना कर डंके की चोट पर कहा…हिन्दुत्व के त्रिदेव
यूपी के योगी, पश्चिम बंगाल के शुभेंदु और असम से हिमंता हिन्दुत्व के पोस्टर बॉय हो गए हैं. त्रिदेव की राजनीति पर एक्सपर्ट का दावा है कि इन्होंने एक पुराने नारे को सच साबित कर दिया है.

“जो हिन्दू हित की बात करेगा, वही देश पर राज करेगा”

योगी, शुभेंदु और हिमंता जो कहते हैं, वो कर देते हैं. इनके दावों में शब्द बेपर्दा होते हैं और शैली बहुत देसी. लहजा बहुत क्रूड रहता है. औपचारिकता और राजनीतिक शिष्टाचार का अनुशासन को तोड़ने की यहां भरपूर आजादी है. त्रिदेव की शैली में बात जब विकास के बाहर आती है तो फिर उसमें उसमें दो ही लेंस हैं- हिन्दू और मुसलमान. मकसद सबका एक है-वो ये कि हिन्दू वोटों का ध्रुवीकरण इतना ज्यादा हो जाए कि मुस्लिम वोटों की विक्ट्री वैल्यू किसी काम की नहीं रहे. मुस्लिम वोटों के दम पर कोई जीत नहीं पाए. सत्ता तक नहीं पहुंच पाए.

प्रचंड हिन्दू पोलराइजेशन की पॉलिटिक्स भारत के चुनाव में नयी है. ये बीजेपी का बड़ा राजनीतिक प्रयोग माना जाता है, क्योंकि बीजेपी के विरोधी राजनीतिक दल मुस्लिम वोट के ध्रुवीकरण का इस्तेमाल विक्ट्री वोट के लिए करते आए हैं. विक्ट्री वोट का मतलब है ऐसा वोट, जिसकी वजह से हार-जीत का फैसला होता है. सत्ता मिलती है या छूट जाती है. योगी आदित्यनाथ ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचार के दौरान साफ-साफ कहा कि “कोई मौलाना क्या बक रहा है, ये चिंता करने की जरूरत नहीं है. आने दीजिए बीजेपी की डबल इंजन की सरकार को, ये आपकी चाटुकारिता करते नजर आएंगे. सड़कों पर झाड़ू लगाते नजर आएंगे. देखो, यूपी में कितना परिवर्तन हो गया है. कोई सड़क पर नमाज नहीं पढ़ सकता है.”

शुभेंदु अधिकारी ने वोटिंग के बाद ईवीएम के बारे में कहा कि “ हिन्दू ईवीएम का वोट मुझे मिला और मुस्लिम ईवीएम का वोट टीएमसी को, ममता बनर्जी को मिला है.”

हिमंता बिस्वा सरमा ने प्रचार के दौरान कहा कि “असम में मैंने बांग्लादेशी मुस्लिम का पोलिटकली टांग तोड़ कर रखा है. इस बार मैंने बोलकर रखा है कि भाई मुझको वोट मत देना. मुझे तुम्हारा वोट नहीं चाहिए. चुनाव के बाद मैं तुम्हारा कमर भी तोड़ने वाला हूं. मैं देश का अकेला ऐसा मुख्यमंत्री हूं, जो कहता है कि मुझे बांग्लादेशी मुसलमान का एक भी वोट नहीं चाहिए. मुझे एक वोट भी नहीं चाहिए.अगर मैं बांग्लादेशी मियां का वोट लेकर सीएम बना तो कुछ नहीं कर पाऊंगा. इसीलिए मुझे बांग्लादेशी मियां का वोट नहीं चाहिए. मुझे भारत के नागरिक का वोट चाहिए. सनातनी हिन्दू का वोट चाहिए.”

जो मेरे साथ, मैं उसके साथ
भारत की चुनावी राजनीति में मुस्लिम वोट बायकॉट की घोषणा पहले सीमित थी. छोटे नेता और फ्रिंज दल चुनाव के दौरान अपने मंच से नारा लगाते थे. जबकि बड़े नेता और केन्द्रीय पार्टी आधिकारिक रूप से सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का दावा करती थीं. मगर अब क्लियर और लाउड तरीके से शुभेंदु अधिकारी कहते हैं कि जो हमारे साथ, हम उसके साथ.

हिन्दू EVM का वोट मुझे मिला है और मुस्लिम EVM का वोट ममता बनर्जी को मिला है. हिन्दू, जैन, बौद्ध, सिख, मारवाड़ी, पूर्वांचली, हिन्दू बंगाली यहां तक कि CPM के हिन्दू वोटर ने भी अपना वोट मुझे ट्रांसफर कर दिया, लेकिन मुसलमानों ने हिजाब पहन कर ममता को वोट दिया. मेरी जीत हिन्दुत्व की जीत है. बंगाल की जीत है. जय श्रीराम.
विपक्ष या मुस्लिम विधायक?
असम विधानसभा में 126 विधायक हैं. मैजिक नंबर 64 है. BJP+ को 102 सीट और 50% वोट मिला है. कांग्रेस और अन्य गैर NDA दलों को 24 विधायक और करीब 44% वोट मिला है. विरोधी खेमें में कुल 24 विधायक हैं. इसमें 22 मुस्लिम हैं. मतलब 92% विपक्ष मुस्लिम हैं. केवल कांग्रेस का देखें तो असम में 95% कांग्रेस के विधायक मुस्लिम हैं. वेस्ट बंगाल में 100% कांग्रेसी विधायक मुस्लिम हैं. केरल में 13% विधायक मुस्लिम हैं. पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के करीब 40% विधायक मुस्लिम हैं. असम में 100% विधायक मुस्लिम.

अब अगर इन आंकड़ों को ध्यान में रखकर आप विधानसभा की तुस्वीर को देखें तो पता चलेगा कि विपक्ष में बड़ा हिस्सा मुस्लिम का है. असम में तो विपक्ष का मतलब मुस्लिम हो गया है. ऐसे में जैसे ही सरकार के किसी नीति-निर्णय का विरोध होगा तो हर चीज में हिन्दू मुस्लिम खोजने वाले, राजनीतिक दलों के लिए नरेटिव तैयार करने वाले फौरन विपक्ष को एंटी हिन्दू, एंटी गवर्नमेंट घोषित कर देंगे. ऐसी स्थिति में राजनीति का चेहरा बहुत बदल जाएगा.