सिंगूर प्रोजेक्ट, सारदा की CBI जांच और अब SIR… 20 साल बाद फिर धरने की राजनीति पर क्यों लौटीं ममता?

लगभग दो दशक बाद ममता फिर से उसी जगह लौट आई हैं, जहां से सब कुछ शुरू हुआ था. लेकिन इस बार व्यवस्थाएं भव्य हैं और लड़ाई कहीं अधिक कठिन है. SIR के खिलाफ कोलकाता के धर्मतल्ला में धरना दे रहीं सीएम ममता बनर्जी की राजनीति का कारण समझिए.कोलकाता:
Mamata Banerjee Protest Kolkata: पश्चिम बंगाल में कुछ दिनों बाद होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज है. ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले सत्ताधारी TMC को इस बार बीजेपी से पूरी टक्कर मिलने की बात कही जा रही है. लगातार 3 बार से बंगाल की सत्ता संभाल रहीं ममता बनर्जी के लिए एंटी इनकंबेंसी की भी चर्चा है. दूसरी ओर दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी होने का दावा करने वाली बीजेपी पूरी ताकत से बंगाल फतह की तैयारी में जुटी है. जानकारों का कहना है कि इस बार ममता बनर्जी को अपने सबसे कठिन चुनाव का सामना करना पड़ रहा है. क्योंकि बीते कुछ सालों में पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने अपनी ताकत काफी बढ़ा ली है.

SIR को ममता ने राजनीतिक अभियान का बनाया केंद्र
BJP से मिल रही चुनौती को साधने के लिए ममता बनर्जी अपने ‘कोर’ पर लौटती नजर आ रही हैं. बंगाल में चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) को ममता बनर्जी ने अपने नवीनतम राजनीतिक अभियान का केंद्र बना लिया है. देश की राजधानी दिल्ली स्थित सुप्रीम कोर्ट से लेकर कोलकाता की सड़कों तक TMC प्रमुख जनता की राय को अपने पक्ष में मोड़ने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं.

कोलकाता के बीचों-बीच धर्मतल्ला पर चल रहा ममता का धरना
राजधानी कोलकाता के बीचों-बीच ईडन गार्डन, राजभवन, कलकत्ता उच्च न्यायालय और विधानसभा के बीच स्थित एक व्यस्त चौराहे पर ममता बनर्जी ने SIR के विरोध में धरना शुरू कर दिया है और भाजपा के खिलाफ अपने आंदोलन को सड़कों पर उतार दिया है. उनके राजनीतिक अभियान का केंद्र मेट्रो वाई चैनल या धर्मतल्ला है.

2006 में यहीं से ममता बनर्जी ने की शुरुआत
यहीं पर 2006 में तत्कालीन विपक्षी नेता ममता ने ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार के खिलाफ 26 दिनों की भूख हड़ताल की थी. ममता बनर्जी के इसी भूख हड़ताल के कारण सिंगूर में लगने वाला टाटा नैनो का प्रोजेक्ट गुजरात में शिफ्ट हुआ था. 2006 में ममता की इस भूख हड़ताल ने देश के राजनीतिक इतिहास में उनकी जुझारू छवि को और मजबूत किया, जिसके चलते वे 2011 में राज्य के सर्वोच्च पद तक पहुंचीं.

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