लोकसभा में राहुल गांधी-ओम बिरला आमने-सामने… जानें क्या है Rule 349, जिस पर संसदीय विशेषज्ञों में भी मतभेद

राहुल गांधी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के बीच अप्रकाशित पुस्तक का हवाला देने को लेकर विवाद ने पूरे सप्ताह लोकसभा की कार्यवाही बाधित की. Rule 349 और Rule 353 की अलग-अलग व्याख्या पर संसदीय विशेषज्ञ बंटे हुए हैं. कुछ इसे नियमों का उल्लंघन मानते हैं, जबकि कुछ राहुल को इसे पढ़ने का अधिकार मानते हैं.लोकसभा में इस सप्ताह अभूतपूर्व गतिरोध देखने को मिला, जब राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव बिना किसी व्यापक चर्चा के केवल वॉइस वोट से पारित करना पड़ा. यह स्थिति उस विवाद के बाद बनी, जिसकी शुरुआत सोमवार को तब हुई जब कांग्रेस सांसद और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की अप्रकाशित किताब का हवाला देने की अनुमति मांगी.

स्पीकर ओम बिरला द्वारा इस अनुरोध को ठुकराने के बाद चार दिनों तक लोकसभा में कामकाज ठप रहा. न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही राहुल गांधी, दोनों में से कोई भी इस महत्वपूर्ण बहस में हिस्सा नहीं ले पाए.

विवाद का केंद्र: लोकसभा का Rule 349
स्पीकर ओम बिरला ने राहुल गांधी को रोकते हुए लोकसभा के Rule 349 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है, ‘सदन की बैठक के दौरान कोई सदस्य ऐसी पुस्तक, समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ेगा जिसका सदन के कार्य से संबंध न हो.’इसके अलावा, स्पीकर ने Rule 353 भी पढ़कर सुनाया, जिसमें किसी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगाने से पहले पर्याप्त जानकारी और नोटिस देने की आवश्यकता बताई गई है. स्पीकर ने कहा कि अप्रकाशित किताब से सामग्री पढ़ना उचित नहीं, क्योंकि यह प्रमाणित नहीं मानी जा सकती.

विशेषज्ञों की राय बंटी
पूर्व सचिव-जनरल स्नेहलता श्रीवास्तव: ‘अप्रकाशित किताब अस्वीकार्य’

लोकसभा की पूर्व सचिव-जनरल स्नेहलता श्रीवास्तव ने कहा कि Rule 349 का दायरा व्यापक है और इस मामले में मुख्य समस्या यह है कि जिस किताब का हवाला दिया जा रहा है, वह अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है. ‘जब किताब प्रकाशित नहीं हुई, तो उसके अंश प्रमाणित नहीं माने जा सकते. लेखक प्रकाशन से पहले सामग्री बदल भी सकता है.’

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पूर्व सचिव-जनरल पी.डी.टी. आचार्य: ‘राहुल गांधी को अधिकार था’

हालांकि, लोकसभा के एक अन्य पूर्व सचिव-जनरल पी.डी.टी. आचार्य इससे इत्तेफाक नहीं रखते. उनका कहना है, ‘Rule 349 का सकारात्मक अर्थ यह है कि यदि किसी विषय का सदन के कामकाज से संबंध है, तो उसे पढ़ा जा सकता है. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस में रक्षा और विदेश नीति जैसे मुद्दे शामिल थे और राहुल गांधी का संदर्भ इन्हीं से जुड़ा था.’

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उन्होंने कहा कि यदि कोई लेख पहले ही पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है और सांसद उसे प्रमाणित कर देता है, तो उसे quote करने की अनुमति दी जाती है. इसलिए राहुल गांधी को रोकना तार्किक नहीं था.

क्या आगे भी बढ़ सकता है विवाद?
Rule 349 की व्याख्या को लेकर संसद में और कानूनी हलकों में चर्चा बढ़ गई है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला भविष्य में संसदीय परंपराओं और सांसदों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है. धन्यवाद प्रस्ताव पर बहस बिना विपक्ष और प्रधानमंत्री की भागीदारी के पारित होना अपने आप में एक असाधारण घटना मानी जा रही है