अल्लाह के शासन के लिए लड़ रहे चुनाव, बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी की कहानी, भारत का करता है विरोध

शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद बांग्लादेश में संसदीय चुनाव कराए जा रहे हैं. इसका मतदान 12 फरवरी को होगा. पाबंदी हटने के बाद जमात-ए-इस्लामी चुनाव मैदान में है. इसके कार्यकर्ता चुनाव जीतने के बाद बांग्लादेश में अल्लाह का शासन स्थापित करने की मांग कर रहे हैं. क्या है इस पार्टी का इतिहास.बांग्लादेश में 2024 में छात्रों के आंदोलन के बाद शेख हसीना की सरकार गिरने बाद पहली बार संसदीय चुनाव कराए जा रहे हैं. इसके लिए 12 फरवरी को मतदान कराया जाएगा. यह बांग्लादेश का 13वां आम चुनाव है. इस बार का मुकाबला मुख्य तौर पर दो गठबंधनों के बीच है. एक गठबंधन का नेतृत्व बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के हाथ में है तो दूसरे का बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी के हाथ में. बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने गुरुवार को अपने चुनाव प्रचार का आगाज किया. पार्टी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने ढाका के मीरपुर में एक जनसभा को संबोधित किया. इस दौरान जमात के कार्यकर्ता यह भी कहते सुने गए कि कुरान की स्थापना के लिए अगर जान और खून देना पड़े तो वे तैयार हैं और वे जुल्म को हराकर अल्लाह का शासन स्थापित करेंगे. आइए जानते हैं कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश कौन है.

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना
जमात-ए-इस्लामी उस बांग्लादेश में अल्लाह का शासन स्थापित करने की बात कर रहा है, जो आबादी के मामले में दुनिया का आठवें नंबर का देश है. बांग्लादेश में दुनिया की चौथी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है. बाग्लादेश जमात-ए-इस्लामी को लोग आम बातचीत में जमात कहकर पुकारते हैं.

जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में इस्लामी विचारक सैयद अबुल आला मौदूदी ने लाहौर में की थी. उस समय भारत का बंटवारा नहीं हुआ था. स्थापना के समय जमात एक इस्लामिक आंदोलन था. बंटवारे बाद भारत में इसका नाम जमात-ए-इस्लामी हिंद हो गया तो पाकिस्तान में वह अपने पुराने नाम पर ही चलता रहा.पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बना तो वहां इसका नाम जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश हो गया. यह संगठन वहां की राजनीति में भी सक्रिय हुआ. बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी की छवि एक कट्टरपंथी पार्टी की है. जमात खुद को बांग्लादेश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी इस्लामिक पार्टी मानता है.

मुक्ति संग्राम में दिया पाकिस्तान का साथ
जमात ने पाकिस्तान के बंटवारे का विरोध किया था. जमात का मानना था कि इससे मुस्लिम राजनीतिक एकता कमजोर होगी और दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बदल जाएगा. जमात के नेताओं पर 1971 के मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का साथ देने और आजाद बांग्लादेश की मांग करने वाले हजारों लोगों की हत्या का आरोप लगा था.शेख हसीना के शासन काल में बांग्लादेश के इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल ने जमात के शीर्ष आठ नेताओं को 2010 में फांसी की सजा सुनाई थी. इसके कई नेताओं को जेल की सजा दी गई थी. इस सजा को शेख हसीना की सरकार ने कड़ाई से लागू किया था.